F.R.I.E.N.D.S.

Saturday, March 24, 2012

अधपकी खिचड़ी जैसी कुछ बात है..



हम पैदा हुए थे जीने के लिए, पर पैदा होते ही हमें जीतने की होड़ में लगा दिया गया..
खुश-नाखुश मैं भी आँख बंद करके दौड़ पड़ा मैदान में..
शुरू में अच्छा भी लगा पर अब भागते भागते सोचता हूँ कि मैं भाग क्यूँ रहा हूँ??
मैं तो खेल का मैदान समझ कर दौड़ा था.. दुनिया ने तो इसको ही ज़िन्दगी का मैदान बना दिया..

मैं भी पूरी जान लगा कर दौड़ा.. याद नहीं अब कि वो RACE में जीता था या हा
रा था..

शायद फर्क भी नहीं पड़ता.. थक के जब मैं आराम करने के लिए कुछ देर रुका तो देखा आस-पास कोई है ही नहीं..

इतनी देर से मैं अकेला ही दौड़ रहा था.. दौड़ते दौड़ते कुछ पीछे छोड़ जरुर आया था..
कुछ हँसते मुस्कुराते जाने-पहचाने चेहरे जो मेरे जीतने कि कामना करते हुए मुझे विदा कर रहे थे..
अब धूमिल से हो गए हैं वो मेरी यादों में..

कुछ भी तो समझ नहीं आता कि अब मैं क्या करूँ..
जीतने कि चाह में, जीना जो भूल आया था मैं..

दौड़ते-दौड़ते शायद काफी आगे निकल आया था मैं..